अंग्रेजी समाचार पत्र ‘मदरलैंड’ के संपादक श्री मलकानी से २३ अगस्त १९७२ को दिल्ली में हुअा वार्तालाप…

अंग्रेजी समाचार पत्र ‘मदरलैंड’ के संपादक श्री मलकानी से २३ अगस्त १९७२ को दिल्ली में हुअा वार्तालाप…

१) श्री मलकानी: राष्ट्रीयता की भावना के पोषण के लिए क्या आप समान नागरिक संहिता को आवश्यक नहीं मानते?

श्री गुरुजी: मैं नहीं मानता । इससे आपको या अन्य बहुतों को आश्चर्य हो सक्ता है, परंतु यह मेरा मत है और जो सत्य मुझे दिखाई देता है, वह मुझे कहना ही चाहिए ।

२) श्री मलकानी: क्या आप यह नहीं मानते कि राष्ट्रीय एकता की वृद्धि के लिए देश में एकरूपता आवश्यक है?

श्री गुरुजी: समरसता और एकरूपता दो अलग-अलग बातें हैं । एकरूपता जरूरी नहीं हैं । भारत में सदा अपरिमित विविधताएँ रही हैं । फिर भी अपना राष्ट्र दीर्घकाल तक अत्यंत शक्तिशाली और संगठित रहा है । एकता के लिए एकरूपता नहीं, अपितु समरसता आवश्यक है ।

३) श्री मलकानी: पश्चिम में राष्ट्रीयता का उदय, कानूनों की संहिताबद्धता, अन्य एकरूपता स्थापित करने का काम साथ ही साथ हुआ है?
 
श्री गुरुजी: यह नहीं भूलना चाहिए कि विश्व-पटल पर यूरोप का आगमन अभी हाल की घटना है और वहाँ की सभ्यता भी अभी नई ही है । पहले उसका कोई अस्तित्व नहीं था और हो सकता है कि भविष्य में उसका अस्तित्व न भी रहे । मेरे मतानुसार, प्रकृति अत्यधिक एकरूपता नहीं चाहती । अत: भविष्य में ऐसी एकविधताओं का पश्चिमी सभ्यता पर क्या परिणाम होगा, इस संबंध में अभी से कुछ कहना बड़ी जल्दबाजी होगी । आज और अभी की अपेक्षा हमें बीते हुए सुदूर अतीत में झाँकना चाहिए और सुदूर भविष्य की ओर दृष्टि दौडा़नी चाहिए । अनेक कार्यों के परिणाम सुदीर्घ, विलंबकारी एवं अप्रत्यक्ष होते हैं । इस विषय में सहस्रावधि वर्षों का हमारा अनुभव है । प्रमाणित सिद्ध हुई समाज-जीवन की पद्धति है । इनके आधार पर हम कह सकते हैं कि विविधता और एकता साथ-साथ रह सकती हैं तथा रहती हैं ।

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